कास्टिंग एक विनिर्माण प्रक्रिया है जिसमें धातु या मिश्र धातु को इतना गरम किया जाता है कि वह तरल रूप ले लेता है और फिर इस तरल धातु को किसी पहले से बनाए गए साँचे (मोल्ड/डाई) की गुहा (cavity) में डाला जाता है। Cavity की ज्यामिति वही होती है जो अंतिम भाग (cast part) का आकार बनती है; जब धातु ठंडी होकर ठोस बनती है तब वह उस Cavity का सटीक आकार ग्रहण कर लेती है। इस प्रक्रिया का मुख्य लाभ यह है कि जटिल आंतरिक और बाह्य ज्यामितियाँ बिना मर्जर-जोड़ के बन सकती हैं, जैसे कि खोखले चैनल, अंडरकट और मल्टी-डायरेक्शनल फीचर्स। कास्टिंग में उपयोग होने वाले मोल्ड एक बार इस्तेमाल होने वाले (expandable) जैसे रेत और निवेश मोल्ड या लंबे समय तक प्रयोग होने वाले स्थायी डाई होते हैं, जिसका चुनाव उत्पादन मात्रा और परिशुद्धता पर निर्भर करता है। संक्षेप में, कास्टिंग धातु को तरल से स्थिर यांत्रिक आकार देना है — जो औद्योगिक उत्पादन में अनिवार्य और बहुमुखी प्रक्रिया है।
Casting का इतिहास और विकास
ढलाई का इतिहास हज़ारों साल पुराना है और मानव सभ्यता के प्रारंभिक तकनीकी विकास के साथ जुड़ा हुआ है। लगभग 3200 ईसा पूर्व में मेसोपोटामिया और प्राचीन चीन में तांबे और कांस्य के छोटे-छोटे उपयोगी उपकरण और आभूषण बनाए जाने लगे, जिससे पता चलता है कि पहले से ही धातु के भौतिक गुणों का व्यावहारिक ज्ञान प्रचलित था। मध्यकालीन और प्रागैतिहासिक काल में रेत ढलाई और खोई हुई मोम (investment) जैसी तकनीकों का विकास हुआ जिसने बड़े-बड़े औजार और घरेलू बर्तनों के निर्माण को संभव बनाया। औद्योगिक क्रांति और भट्ठी तथा डाई-निर्माण के उन्नत उपकरणों के आने के बाद कास्टिंग का दायरा तेजी से विस्तारित हुआ; आज रॉकेट इंजन के जटिल पंखों से लेकर भारी स्टीम टरबाइन के हाउसिंग तक अनेक हिस्से कास्टिंग से बनते हैं। यानि कास्टिंग की विकास यात्रा तकनीक, सामग्री विज्ञान और औद्योगिक आवश्यकताओं के साथ लगातार विकसित होती रही है।
Casting Process
कास्टिंग की प्रक्रिया को समझने के लिए उसे कुछ चरणों में विभाजित किया जा सकता है — मोल्ड डिजाइन और पैटर्न, मोल्ड बनाना, धातु का पिघलाना, भरना (pouring), ठंडा करना और ठोस बनना, तथा अंतिम निकालना और पोस्ट प्रोसेसिंग। प्रत्येक चरण का अपना महत्व और तकनीकी विवरण होता है, जो अंतिम भाग की गुणवत्ता और लागत को प्रभावित करता है। नीचे हर चरण का विस्तारपूर्वक विवरण दिया जा रहा है ताकि प्रक्रिया की सूक्ष्म बातें समझ में आएँ।
1.पैटर्न और मोल्ड का डिजाइन
पैटर्न वह प्राइमरी आइटम है जो मोल्ड की Cavity बनाए रखने में मदद करता है; यह अक्सर लकड़ी, प्लास्टिक, धातु या मोम से बनाया जाता है। पैटर्न डिजाइन करते समय सिकुड़न भत्ते (shrinkage allowance), ड्राफ्ट एंगल (draft angles) और रिमूवल के लिए रिस्को (parting line) जैसे फैक्टर ध्यान में रखे जाते हैं ताकि मोल्ड से पैटर्न आसानी से निकले और फाइनल पार्ट सटीक रहे। यदि आंतरिक फीचर्स चाहिए तो कोर के उपयोग की योजना बनानी पड़ती है; कोर अलग से बनाए जाते हैं और मोल्ड के अंदर फिट होते हैं ताकि छेद और चैनल बन सकें। गेटिंग सिस्टम, जिसमें स्प्रू, रनर और गेट शामिल होते हैं, भी प्रारंभिक डिज़ाइन का हिस्सा होते हैं जो धातु के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं और ठोसीकरण के दौरान Defects को न्यूनतम करने में मदद करते हैं। पैटर्न की सामग्री और उसके सतह फिनिश का चयन भी महत्वपूर्ण होता है — चिकना पैटर्न बेहतर सतह खत्म देता है और मोल्ड में कम खराबी बनती है
2. मोल्ड/डाई बनाना
मोल्ड दो प्रकार के हो सकते हैं: अस्थायी (expandable) जैसे रेत और निवेश मोल्ड, या स्थायी (permanent) जैसे स्टील/एल्युमिनियम डाई। अस्थायी मोल्ड सस्ता और छोटे बैच के लिए उपयुक्त होते हैं जबकि स्थायी डाई उच्च उत्पादन व बार-बार उपयोग के लिए बेहतर होते हैं। मोल्ड बनाते समय मोल्डिंग सामग्री, बाइंडर, तथा कोर सटीकता का ध्यान रखा जाता है — रेत में सांचे की ताकत और गैस पारगम्यता आवश्यक मापदंड होते हैं। डाई बनाने के लिए CNC मशीनिंग और EDM जैसी तकनीकों का उपयोग होता है ताकि लाखों साइकिल तक टिकने वाला कठोर टूलिंग मिल सके। मोल्ड के अंदर ठंडा करने के चैनल और राइज़र के स्थान की योजना भी निर्मित की जाती है ताकि प्रवाह और शीतलन नियंत्रित रहे।
3.धातु का पिघलाना (Melting)
धातु को पिघलाने के लिए विभिन्न प्रकार की भट्टियाँ और तंत्र प्रयोग में आते हैं — इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस, इंडक्शन फर्नेस, क्रूसिबल फर्नेस आदि। भट्ठी का चुनाव उस धातु के गलनांक, मात्रा और लागत पर निर्भर करता है; उदाहरण के लिए स्टेनलेस स्टील को पिघलाने के लिए उच्च तापमान वाली इंडक्शन भट्ठियाँ उपयुक्त होती हैं। पिघली धातु में मिश्रण, रासायनिक नियंत्रण और गैस के अवशोषण का ख्याल रखा जाता है — अक्सर डीजसिंग और वाक्सिंग जैसी प्रक्रियाएँ की जाती हैं। तापमान को नियंत्रित रखना महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अधिक या कम तापमान से प्रवाहशीलता और अंतर्निहित धातु संरचना प्रभावित होती है। पिघली धातु की साफ़-सफ़ाई और रासायनिक गुण सुनिश्चित करने के लिए फ़िल्टरिंग व स्किमिंग भी आवश्यक होते हैं ताकि लो-जंक्शन और सम्मिश्रण दोष कम हों।
4. डालना/भरण (Pouring)
पिघली धातु को मोल्ड में डालने के लिए सही तकनीक व गति ज़रूरी होती है। गेटिंग सिस्टम और स्प्रू-रनर डिज़ाइन का उद्देश्य प्रवाह को नियंत्रित करना और गुहा के हर हिस्से में धातु पहुँचाना है, साथ ही गैस जमे होने और प्रवाह अशांति (turbulence) की संभावना घटाना भी इसका लक्ष्य है। डालने के दौरान ठंडा होने की दिशा, राइज़र का कार्य और परिवेशीय स्थितियाँ ध्यान में रखकर प्रक्रिया संचालित की जाती है। बड़े पार्ट्स के लिए करछुल (ladle) व मशीन-आधारित टिल्ट/ट्रांसफर सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है ताकि इंसानी गलती और ताप-हानि कम हो। लगातार कास्टिंग या स्वचालित पोरिंग स्टेशनों में टाइमिंग और कंट्रोल उच्च स्तर पर होता है जिससे गुण और रिपीटेबिलिटी सुनिश्चित होती है।
5. ठंडा होना और ठोस बनना (Cooling and Solidification)
जब तरल धातु मोल्ड में भर जाता है तो वह क्रिस्टल निष्कर्षण (nucleation) और अनाज-विकास (grain growth) के जरिए ठोस बनता है। ठंडा होने की दर, तापमान-ग्रेडिएंट्स और ठोसिका का दिशा-बाध्य प्रभाव यांत्रिक गुणों जैसे ताकत, कठोरता और थकान प्रतिरोध पर निर्णायक होते हैं। नियंत्रित शीतलन के लिये कूलिंग चैनल, कूलेंट प्रवाह या गुरुत्वाकर्षण/केंद्रापसारक बल का इस्तेमाल किया जा सकता है ताकि आवश्यक अनाज-संरचना प्राप्त हो। कुछ प्रक्रियाओं में सॉलिडिफिकेशन के दौरान राइज़र तरल धातु पूर्ति हेतु शामिल रहते हैं, जिससे सिकुड़न-खामियों का निवारण हो। शीतलन के बाद मोल्ड से बाहर निकाले जाने तक पर्याप्त समय देने की आवश्यकता होती है वरना भाग आकृति बदल सकती है या आंतरिक तनाव रह सकता है।
5. मोल्ड से निकालना और पोस्ट-प्रोसेसिंग
मोल्ड से निकाले जाने के बाद कास्ट पार्ट पर स्प्रू, रनर व राइज़र के अवशेष होते हैं जिन्हें काटकर हटाया जाता है। अस्थायी मोल्ड (जैसे रेत/निवेश) को तोड़कर भाग निकाला जाता है; वहीं स्थायी डाई में इजेक्टर सिस्टेम द्वारा भाग निकाला जाता है। इसके बाद ट्रिमिंग, ग्राइंडिंग, मशीनिंग व सतह उपचार किए जाते हैं ताकि आयामी सहनशीलताएँ और सतह फिनिश आवश्यक स्तर पर पहुँचें। तापीय उपचार (heat treatment) और तनाव-रिलीज़िंग जैसी प्रक्रियाएँ आवश्यक गुणों को प्राप्त करने के लिये की जाती हैं। अन्ततः, सत्यापन परीक्षण जैसे डायमेंशनल निरीक्षण और गैर-विनाशकारी परीक्षण करके गुणवत्ता सुनिश्चित की जाती है।
कास्टिंग की प्रमुख विधियाँ
निम्नलिखित कास्टिंग विधियाँ उद्योगों में सर्वाधिक प्रयोग की जाती हैं; हर विधि की अपनी विशेषताएँ, लाभ और सीमाएँ होती हैं जिनके आधार पर उनका चयन किया जाता है। हर विधि का वर्णन यहाँ विस्तार से दिया गया है।
रेत ढलाई (Sand Casting)
रेत ढलाई पारंपरिक और बहुप्रचलित विधि है जिसमें सिलिका रेत और बाइंडर की मदद से मोल्ड बनता है। यह तकनीक आकार और ज्यामिति के मामले में बहुत लचीली है — छोटे प्रोटोटाइप से लेकर बड़े भारी हिस्सों तक इसे आसानी से अपनाया जा सकता है। रेत मोल्ड अक्सर दो भागों — कोप और ड्रैग — में बनते हैं और उनका सटीक संरेखण सुनिश्चित करने के लिए पिन और रीसेट सिस्टम का उपयोग होता है। लागत अपेक्षाकृत कम होती है क्योंकि मोल्ड सस्ते पदार्थों से बनते हैं और टूलिंग खर्च न्यूनतम होता है; इसलिए छोटी और मध्यम सीरिज के लिए यह उपयुक्त है। हालाँकि सतह फिनिश और आयामी सहनशीलता सीमित हो सकती है, पर आधुनिक प्रक्रिया नियंत्राण और पोस्ट-फिनिशिंग के माध्यम से अधिकतर आवश्यकताएँ पूरी की जा सकती हैं।
निवेश ढलाई / लॉस्ट वैक्स (Investment Casting)
निवेश कास्टिंग या खोई हुई मोम विधि में सटीक और जटिल ज्यामितियों के निर्माण के लिए मोम-आधारित पैटर्न का उपयोग किया जाता है जिसे सिरेमिक कोटिंग द्वारा ढका जाता है। जब सिरेमिक परत सूख जाती है और कठोर हो जाती है, तब मोम को हटाकर अंदर एक सटीक Cavity बनती है — इस प्रकार पतली दीवारें और अंडरकट भी बिना कोर के बनाए जा सकते हैं। निवेश कास्टिंग उच्च सतह समाशोधन (surface finish) और उत्तम आयामी सटीकता प्रदान करती है, जिससे भारी मशीनिंग की आवश्यकता घट जाती है और विशेष रूप से जटिल एयरोस्पेस तथा मेडिकल कंपोनेंट्स में इसकी मांग अधिक है। यह विधि छोटे से मध्यम साइज और उच्च परिशुद्धता वाले भागों के लिए आर्थिक होती है, परंतु पैटर्न बनाने और सिरेमिक कोशिकाओं के कारण समय और लागत अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है। निवेश कास्टिंग से प्राप्त भागों की अनआवश्यक अशुद्धियाँ कम होती हैं और यांत्रिक गुण भी नियंत्रणीय होते हैं।
डाई कास्टिंग (Die Casting)
डाई कास्टिंग में उच्च शक्ति वाले स्टील या हार्ड मेटल की बनी स्थायी डाई का प्रयोग होता है जिसमें प्रेशर के साथ पिघली धातु को इंजेक्ट किया जाता है। यह प्रक्रिया विशेषकर जस्ता, एल्यूमीनियम और मैग्नीशियम जैसे निचले गलनांक वाले धातुओं के लिए उपयुक्त है। डाई कास्टिंग बहुत उच्च उत्पादन दर और एकरूपी सतह गुणवत्ता देती है, जिससे पोस्ट-प्रोसेसिंग की आवश्यकता घट जाती है और प्रति-उत्पादन यूनिट लागत कम होती है। टूलिंग और प्रारम्भिक निवेश महंगा होता है, परन्तु बड़े उत्पादन रन में यह आर्थिक रूप से लाभकारी सिद्ध होता है। इसके अलावा डाई कास्टिंग से थोड़े अधिक दबाव पर कास्ट होने के कारण भौतिक गुणों में भी स्थिरता आती है और ज्यादातर बार निकट-नेट-शेप भाग प्राप्त होते हैं।
केन्द्रापसारक / सेंट्रीफ्यूगल कास्टिंग (Centrifugal Casting)
इस विधि में एक बेलनाकार मोल्ड को उच्च गति से घुमाया जाता है और पिघली धातु को मोल्ड के अंदर डाला जाता है। केन्द्रापसारक बल धातु को मोल्ड दीवार के विरुद्ध धकेलता है जिससे एक सघन और हानि-रहित परत बनती है। इस तकनीक का लाभ यह है कि गैस पॉकिट्स और सिकुड़न जैसी परेशानियां न्यूनतम होती हैं और अनाज संरचना संतुलित व समरूप बनती है। यह विशेषकर पाइप, सिलेंडर, स्लीव तथा डिस्क जैसे सममित घटकों के लिए उपयुक्त है। केन्द्रापसारक कास्टिंग में सामग्री की खपत भी कम होती है क्योंकि राइज़र की आवश्यकता नहीं रहती और संरचनात्मक अखंडता बेहतर मिलती है।
कम दबाव कास्टिंग (Low Pressure Casting)
कम दबाव कास्टिंग में फर्नेस से धातु को नियंत्रित, निम्न दबाव की सहायता से मोल्ड में भेजा जाता है — आम तौर पर 0.02 से 0.07 MPa तक। यह विधि तेज और शांत प्रवाह देती है जिससे सतह दोष और गैस-फंसाव कम होते हैं। एल्यूमीनियम और उसके मिश्रधातुओं के लिए यह तकनीक बहुत प्रचलित है, खासकर व्हील हब तथा सिलेंडर हाउसिंग मे
कास्टिंग से बनने वाले प्रमुख Defects(Casting defects in hindi )
Porosity (छिद्र या छोटे छेद) – यह defect तब होता है जब पिघली हुई धातु में गैसें (जैसे हाइड्रोजन) फँस जाती हैं और ठोस होने के बाद छोटे-छोटे छेद छोड़ देती हैं। Porosity strength को कम कर देती है और धातु भंगुर हो जाती है। यह प्रायः एल्युमीनियम और मैग्नीशियम alloys में अधिक देखने को मिलता है। समाधान: Degassing agents का प्रयोग और सही pouring temperature।
Shrinkage Defect (सिकुड़न से जुड़ी समस्या) – धातु ठंडी होने पर सिकुड़ती है। यदि मोल्ड डिज़ाइन में riser ठीक से न लगाया गया हो तो अंदर cavities या voids बन जाते हैं। यह defect mechanical strength और durability को प्रभावित करता है। समाधान: Riser और feeding system का सही डिज़ाइन।
Cold Shut (अधूरी जुड़ाई) – तब होता है जब दो अलग-अलग धातु धाराएँ (metal streams) मोल्ड cavity में पूरी तरह से fuse नहीं होतीं। इसके कारण जॉइंट कमजोर रह जाता है और crack आ सकते हैं। कारण: Metal का तापमान कम होना या filling speed कम होना।
Misrun (अधूरा भराव) – जब धातु cavity के सभी हिस्सों तक नहीं पहुँच पाती, तब अधूरा casting shape बनता है। यह प्रायः low fluidity और improper gating system के कारण होता है।
Sand Inclusion (रेत का फँसना) – Sand casting में मोल्ड की रेत पिघली धातु के साथ cavity में चली जाती है। अंतिम casting में sand particle फँस जाते हैं जिससे surface rough और weak हो जाती है।
Hot Tear (गरमी से दरार) – ब casting ठंडी होते समय unequal contraction होता है तो दरारें पड़ जाती हैं। यह defect stress concentration और improper mold design के कारण होता है।
Casting के फायदे (Advantages of Metal Casting)
कास्टिंग की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण इसके लाभ हैं। अन्य manufacturing processes (जैसे forging, machining, welding) की तुलना में इसमें कई अनोखे फायदे मिलते हैं।
जटिल आकार बनाना आसान – Casting में hollow shapes, intricate designs और बहुत छोटे-छोटे details आसानी से बनाए जा सकते हैं। उदाहरण: इंजन ब्लॉक, turbine blade, medical implants।
आकार और वजन में कोई सीमा नहीं – इससे कुछ ग्राम से लेकर कई टन वज़न तक के parts बनाए जा सकते हैं। जैसे – jewelry casting से लेकर बड़े जहाज के propeller तक।
लगभग सभी धातुओं और alloys में संभव – चाहे लोहा हो, स्टील हो, एल्युमीनियम, मैग्नीशियम या कॉपर alloys – casting हर जगह लागू होती है। High melting point वाले metals को भी विशेष furnaces में cast किया जा सकता है।
Material wastage कम – Forging या machining की तुलना में casting में बहुत कम scrap निकलता है। इससे production cost घटती है और sustainability बढ़ती है।
Mass Production के लिए उपयुक्त – Die casting और investment casting जैसी विधियों से एक ही design को बार-बार mass scale पर produce किया जा सकता है। इससे automotive और aerospace industries में huge demand पूरी होती है।
Casting के उपयोग (Applications of Casting)
ऑटोमोबाइल उद्योग – इंजन ब्लॉक, सिलेंडर हेड, पिस्टन, गियर बॉक्स हाउसिंग, wheel rims आदि parts casting द्वारा बनाए जाते हैं। एल्युमीनियम और मैग्नीशियम alloys lightweight होने के कारण अधिक उपयोग किए जाते हैं।
एयरोस्पेस उद्योग – जेट इंजन की turbine blades, compressor housing, fuel system components casting द्वारा ही बनते हैं। यहां super alloys का उपयोग होता है जो high temperature और high pressure सह सकें।
मेडिकल फील्ड – Artificial joints, dental implants और surgical instruments investment casting द्वारा बनाए जाते हैं। इसमें high accuracy और biocompatible alloys का प्रयोग आवश्यक है।
ऊर्जा और पावर सेक्टर – Hydro turbine casings, generator housings, pump bodies और valve parts casting द्वारा तैयार होते हैं। यहां corrosion resistant alloys का उपयोग होता है।
निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर – पाइप, कॉलम, ब्रिज components और heavy machinery parts अक्सर casting से ही बनते हैं।
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