What is Transformer, Working Principle,Types of Transformer & It’s Losses

ट्रांसफॉर्मर (Transformer)

परिचय (Introduction)

विद्युत अभियांत्रिकी (Electrical Engineering) में ट्रांसफॉर्मर एक अत्यंत महत्वपूर्ण यंत्र है। आधुनिक विद्युत शक्ति प्रणाली का अस्तित्व ट्रांसफॉर्मर के बिना संभव नहीं है। ट्रांसफॉर्मर का मुख्य कार्य वैकल्पिक धारा (AC) की वोल्टेज को बढ़ाना या घटाना होता है, बिना आवृत्ति (Frequency) बदले। उत्पादन केंद्र से उपभोक्ता तक विद्युत ऊर्जा को सुरक्षित, कुशल और आर्थिक रूप से पहुँचाने में ट्रांसफॉर्मर की भूमिका अत्यंत आवश्यक है।

ट्रांसफॉर्मर का उपयोग विद्युत उत्पादन, संचरण, वितरण, उद्योगों, घरेलू उपकरणों, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा पावर सप्लाई प्रणालियों में व्यापक रूप से किया जाता है। इस लेख में हम ट्रांसफॉर्मर के निर्माण, कार्य सिद्धांत, प्रकार, हानियाँ, दक्षता, शीतलन विधियाँ, अनुप्रयोग तथा परीक्षा व साक्षात्कार से जुड़े प्रश्नों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

ट्रांसफॉर्मर की परिभाषा

ट्रांसफॉर्मर एक स्थिर (Static) विद्युत यंत्र है जो विद्युत चुम्बकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) के सिद्धांत पर कार्य करता है और वैकल्पिक धारा की वोल्टेज तथा धारा को एक परिपथ से दूसरे परिपथ में स्थानांतरित करता है, जबकि आवृत्ति समान रहती है।

सरल शब्दों में, ट्रांसफॉर्मर वोल्टेज को बढ़ाने (Step-Up) या घटाने (Step-Down) के लिए प्रयोग किया जाता है।

ट्रांसफॉर्मर का सिद्धांत (Principle of Transformer)

ट्रांसफॉर्मर परस्पर प्रेरण (Mutual Induction) के सिद्धांत पर कार्य करता है। जब प्राथमिक कुंडली (Primary Winding) में वैकल्पिक धारा प्रवाहित की जाती है, तो उसके चारों ओर परिवर्तित चुम्बकीय फ्लक्स उत्पन्न होता है। यह फ्लक्स द्वितीयक कुंडली (Secondary Winding) को काटता है, जिसके कारण उसमें विद्युत वाहक बल (EMF) उत्पन्न होता है।

इस प्रक्रिया में:

विद्युत ऊर्जा सीधे एक कुंडली से दूसरी कुंडली में नहीं जाती

ऊर्जा का स्थानांतरण चुम्बकीय क्षेत्र के माध्यम से होता है

Important Points:

  • ट्रांसफॉर्मर केवल AC पर कार्य करता है
  • DC पर ट्रांसफॉर्मर कार्य नहीं करता

ट्रांसफॉर्मर का निर्माण (Construction of Transformer)

ट्रांसफॉर्मर के मुख्य भाग निम्नलिखित होते हैं:

1. कोर (Core)– कोर सिलिकॉन स्टील की पतली- पतली चादरों से बनाया जाता है। इसका कार्य चुंबकीय फ्लक्स को एक नियंत्रित मार्ग प्रदान करना होता है।

कोर(Core) के कार्य:

  • फ्लक्स के लिए कम प्रतिरोध वाला मार्ग देना
  • ऊर्जा हानि को कम करना

कोर(Core) के प्रकार:

  • कोर टाइप (Core Type)
  • शेल टाइप (Shell Type)

2. प्राथमिक कुंडली (Primary Winding)– यह वह कुंडली होती है जिसमें इनपुट वोल्टेज लगाया जाता है। इसी कुंडली में धारा प्रवाहित होकर चुंबकीय फ्लक्स उत्पन्न करती है।

3. द्वितीयक कुंडली (Secondary Winding) – इस कुंडली में प्रेरित EMF उत्पन्न होता है और यहीं से आउटपुट वोल्टेज प्राप्त किया जाता है।

4. इंसुलेशन (Insulation) – कुंडलियों के बीच तथा कोर से विद्युत पृथक्करण के लिए कागज, वार्निश, प्रेसबोर्ड आदि का उपयोग किया जाता है।

5. टैंक और तेल (Tank & Oil) – पावर ट्रांसफॉर्मर में कोर और कुंडलियों को तेल से भरे टैंक में रखा जाता है। तेल का कार्य: शीतलन (Cooling), विद्युत इन्सुलेशन

ट्रांसफॉर्मर का कार्य सिद्धांत (Working Principle)

  • जब प्राथमिक कुंडली में AC वोल्टेज लगाया जाता है:
  • प्राथमिक कुंडली में धारा प्रवाहित होती है
  • परिवर्तित चुंबकीय फ्लक्स उत्पन्न होता है
  • यह फ्लक्स कोर के माध्यम से द्वितीयक कुंडली को काटता है
  • द्वितीयक कुंडली में EMF प्रेरित होता है
  • यदि लोड जोड़ा जाए, तो धारा प्रवाहित होने लगती है

EMF समीकरण:

E = 4.44 × f × N × Φm

जहाँ,
E = प्रेरित EMF (वोल्ट)
f = आवृत्ति (हर्ट्ज)
N = कुंडली के चक्कर
Φm = अधिकतम फ्लक्स (वेबर)

वोल्टेज अनुपात (Transformation Ratio)

V1 / V2 = N1 / N2

जहाँ,
V1 = प्राथमिक वोल्टेज
V2 = द्वितीयक वोल्टेज
N1 = प्राथमिक चक्कर
N2 = द्वितीयक चक्कर

ट्रांसफॉर्मर के प्रकार (Types of Transformer)

1. कार्य के आधार पर

(क) स्टेप-अप ट्रांसफॉर्मर – जिसमें द्वितीयक वोल्टेज प्राथमिक से अधिक होता है।
उपयोग: विद्युत संचरण में

(ख) स्टेप-डाउन ट्रांसफॉर्मर – जिसमें द्वितीयक वोल्टेज प्राथमिक से कम होता है।
उपयोग: घरेलू आपूर्ति, चार्जर

2. निर्माण के आधार पर – कोर टाइप ट्रांसफॉर्मर , शेल टाइप ट्रांसफॉर्मर

3. उपयोग के आधार पर – पावर ट्रांसफॉर्मर, डिस्ट्रिब्यूशन ट्रांसफॉर्मर, इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफॉर्मर, करंट ट्रांसफॉर्मर (CT), पोटेंशियल ट्रांसफॉर्मर (PT)

4. फेज के आधार पर – सिंगल फेज ट्रांसफॉर्मर, थ्री फेज ट्रांसफॉर्मर

ट्रांसफॉर्मर में हानियाँ (Losses in Transformer)

1. आयरन लॉस (Core Loss)

(क) हिस्टेरिसिस लॉस – चुंबकीय क्षेत्र के बार-बार बदलने से उत्पन्न होती है।

(ख) एडी करंट लॉस – कोर में प्रेरित धारा के कारण उत्पन्न होती है।

2. कॉपर लॉस – कुंडलियों के प्रतिरोध के कारण I²R हानि होती है।

3. स्ट्रे लॉस – फ्लक्स के रिसाव के कारण उत्पन्न होती है।

ट्रांसफॉर्मर की दक्षता (Efficiency)

दक्षता = आउटपुट पावर / इनपुट पावर

η = (Pout / Pin) × 100

ट्रांसफॉर्मर की दक्षता बहुत अधिक होती है, सामान्यतः 95% से 99% तक।

शीतलन विधियाँ (Cooling Methods)

  • एयर नेचुरल (AN)
  • एयर फोर्स्ड (AF)
  • ऑयल नेचुरल एयर नेचुरल (ONAN)
  • ऑयल नेचुरल एयर फोर्स्ड (ONAF)
  • ऑयल फोर्स्ड वाटर कूल्ड (OFWC)

ट्रांसफॉर्मर के अनुप्रयोग (Applications)

  • विद्युत उत्पादन केंद्र
  • ट्रांसमिशन लाइन
  • वितरण प्रणाली
  • मोबाइल चार्जर
  • UPS और इन्वर्टर
  • उद्योग
  • सबस्टेशन

निष्कर्ष

ट्रांसफॉर्मर विद्युत शक्ति प्रणाली का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। इसके बिना उच्च वोल्टेज संचरण, सुरक्षित वितरण और आधुनिक विद्युत प्रणाली संभव नहीं है। इसके सिद्धांत, निर्माण और कार्य को समझना प्रत्येक विद्युत अभियंता और विद्यार्थी के लिए आवश्यक है। यह यंत्र न केवल ऊर्जा की बचत करता है बल्कि विद्युत आपूर्ति को विश्वसनीय और आर्थिक बनाता है।

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